नवरात्री का पहला दिन,पूजा विधि, नियम और आरती

नवरात्रि के पहले दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है.शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप मे जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा.बैल पर स्थित माता शैलपुत्री के दाएं हाथ मे त्रिशूल ओर बाएं हाथ मे कमल फूल सुशोभित है

नौ दिनों का यह पावन पर्व नवरात्र इस बार 17 अक्टूबर से शुरू हो रहा है जोकि 25 अक्टूबर तक रहेगा.माँ अंबे इस नवरात्री मेंं धरती पर घोड़े पर सवार होकर आ रही है जिसका मतलब देवी भागवत पुराण के अनुसार पड़ोसी से युध्द ,गृह-युध्द ,आँधी-तूफान और सत्ता में उथल- पुथल की संभावना रहेगी.

जानें किस दिन होगी कौन सी देवी की पूजा

पहले दिन- मां शैलपुत्री पूजा और घटस्थापना
दूसरे दिन- मां ब्रह्मचारिणी पूजा
तीसरे दिन- मां चंद्रघंटा पूजा
चौथे दिन- मां कुष्मांडा पूजा
पांचवे दिन- मां स्कंदमाता पूजा
छठे दिन-  मां कात्यायनी पूजा
सातवें दिन – मां कालरात्रि पूजा
आठवें दिन- मां महागौरी दुर्गा पूजा
नौवें दिन- मां सिद्धिदात्री पूजा

क्या होगा घट स्थापना का शुभ मुहूर्त

17 अक्टूबर को पंचांग के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि रहेगी.इस दिन घट स्थापना मुहूर्त का समय सुबह 06 बजकर 27 मिनट से 10 बजकर 13 मिनट तक रहेगा. घटस्थापना के लिए मुहूर्त सुबह 11बजकर 44 मिनट से 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा.

मां शैलपुत्री पूजा

नवरात्रि के पहले दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है.शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप मे जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा.बैल पर स्थित माता शैलपुत्री के दाएं हाथ मे त्रिशूल ओर बाएं हाथ मे कमल फूल सुशोभित है.नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है.नवरात्र के इस पहले दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार चक्र’ में स्थित करते हैं और यही से उनकी योग साधना की शुरूआत होती है.

मां शैलपुत्री का उपासना मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

मां शैलपुत्री के मंत्र का एक माला जाप करने पर सभी मनोरथ पूर्ण होते है.मां शैलपुत्री शक्ति, आधार व स्थिरता की प्रतीक है. इस देवी की उपासना जीवन मे स्थिरता देती है.इस दिन मां के चरणों में गाय के शुद्ध घी को अर्पित करें व दान करें. ऐसा करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है.

व्रत की पूजा विधि क्या है

नवरात्रि में सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें और पूजा घर में पूजा सामग्रियों को एक जगह एकत्रित कर लें. इसके बाद मां दुर्गा की फोटो को लाल रंग के कपड़े के आसन पर रखें. फिर पूजा की थाली को सजाएं उसमें सभी तरह की पूजा सामग्री को रखें. मिट्टी के कलश की स्थापना के लिए रेत में जौ के बीज को बोएं और कलश को स्थापित करे.नौ दिनों तक रेत में पानी का छिड़काव करें. शुभ मुहूर्त में कलश में गंगाजल डाले और आम की पत्तियां रखकर उस पर जटा नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलश पर स्थापित करें.

जानिए व्रत के नियम 

व्रत में माता जी की पूजा करने के बाद ही फलाहार करें. मतलब सुबह माता जी की पूजा के बाद दूध और कोई फल ले सकते हैं. व्रत के दौरान नमक नहीं खाना चाहिए. इसके बाद दिनभर मन ही मन माता जी का ध्यान करते रहें. शाम को फिर से माता जी की पूजा और आरती करें. इसके बाद एक बार और अपनी यथाशक्ति फलाहार कर सकते हैं या उपवास भी रह सकते हैं. अगर न कर सके तो शाम की पूजा के बाद एक बार आप सेंधा नमक से बना भोजन कर सकते हैं.

मां शैलपुत्री की कहानी

मां शैलपुत्री सती के नाम से भी जानी जाती हैं.एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ करवाने का फैसला लिया. जिसके लिए उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा लेकिन भगवान शिव को नहीं भेजा.देवी सती को लगा कि उनके पास निमंत्रण आएगा पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन वो उस यज्ञ में जाने के लिए बेचैन थीं पर भगवान शिव ने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि यज्ञ में जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण नहीं आया है इसलिए वहां जाना ठीक नहीं है.सती नहीं मानीं और बार-बार यज्ञ में जाने का निवेदन करती रहीं. सती के ना मानने की वजह से शिव को उनकी बात माननी पड़ी और अपनी स्वीकृति दे दी.सती जब अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहां पहुंची तो देखा कि उनसे आदर और प्रेम के साथ कोई भी बातचीत नहीं कर रहा है. सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं और सिर्फ उनकी माता ने प्यार से उन्हें गले लगाया. उनकी बाकी बहनें उनका उपहास उड़ा रहीं थीं और सति के पति भगवान शिव का भी अपमान कर रहीं थीं. दक्ष ने भी अपमान करने का कोई मौका ना छोड़ा.यह व्यवहार देख सती बड़ी दुखी हो गईं. अपना और अपने पति का अपमान उनसे सहन नहीं हुआ…और अगले ही पल उन्होंने जो कदम उठाया उसकी कल्पना स्वयं दक्ष ने भी नहीं की होगी. सती ने जब उसी यज्ञ की अग्नि में खुद को स्वाहा कर अपने प्राण त्याग दिए.तब भगवान शिव को जैसे ही इस बारे में पता चला तो वो दुखी हो गए.दुख और गुस्से की ज्वाला में जलते हुए शिव जी ने उस यज्ञ को ध्वस्त कर दिया. इसी सती ने फिर हिमालय के यहां जन्म लिया और वहां जन्म लेने की वजह से ही इनका नाम शैलपुत्री पड़ा.

शैलपुत्री का ही नाम पार्वती भी है. इनका विवाह भी भगवान शिव से ही हुआ। मां शैलपुत्री का वास-स्थान काशी नगरी, वाराणसी में माना जाता है. वहां शैलपुत्री का एक बहुत पुराना मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां मां शैलपुत्री के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तजनों की मुरादें पूरी होती हैं. कहा जाता है कि नवरात्र के पहले दिन यानि प्रतिपदा को जो भी भक्त मां शैलपुत्री के दर्शन करता है उसके सारे वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं. मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ है मतलब बैल, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है. इनके बाएं हाथ में कमल और दाएं हाथ में त्रिशूल रहता है।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आरती

 

Credit -VNS Records

शैलपुत्री मां बैल सवार। करें देवता जय जयकार। शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे। ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी। उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो। घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के। श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे। मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

 

 

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